श्रीमद्भगवद्गीता

*।। समष्टिजीवन में लोकजीवन की उन्मुखता ।।* सकारात्मक और नकारात्मक की कसौटी एकमात्र लोकजीवन ही है, समष्टिजीवन! लोकजीवन के प्रति उन्मुख हो जाने का अर्थ सकारात्मकता है! लोकजीवन से पराङ्मुख होना नकारात्मकता है!व्यक्ति का जीवन जब समष्टि के साथ एकात्म हो जाता है, तब ही वह सच्ची सकारात्मकता को प्राप्त करता है। लोकजीवन अर्थात् समाज के सामूहिक हित, संस्कृति और परंपराओं की ओर मुख करना ही मानव का सच्चा पुरुषार्थ है। पराङ्मुख व्यक्ति स्वार्थ और अलगाव में डूबकर अपनी आत्मा को ही क्षति पहुँचाता है, जबकि उन्मुख व्यक्ति राष्ट्र और विश्व की एकता में योगदान देता है। भारतीय दर्शन में यह एकात्मता ही जीवन का मूल आधार है, जहाँ व्यष्टि समष्टि में विलीन होकर अमर हो जाती है। इसलिए, लोकजीवन की ओर बढ़ना न केवल सकारात्मकता है, बल्कि मानव जीवन की पूर्णता का मार्ग भी है! *आज का दिन शुभ मंगलमय हो।* *astrosanjaysinghal*