श्रीमद्भगवद्गीता

*इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।* *निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।* गीता : अध्याय ५, श्लोक १९। जिस मनुष्य का मन सम-भाव में स्थित रहता है, उसके द्वारा जन्म-मृत्यु के बंधन रूपी संसार को जीत लिया जाता है क्योंकि वह ब्रह्म के समान निर्दोष एवं सम होता है और सदा परमात्मा में ही स्थित रहता है। तुलसीदास जी ने भी इस तथ्य को सरल शब्दों में कहा है: *समरथ कहुँ नहि दोष गुसाईं।* *रवि पावक सुरसरि की नाईं।* *रवि पावक गंगा के जैसे, दोष स्वयं के दूर करें,* *परम लक्ष्य हो राम हमारा, व्यर्थ अहम को दूर करें।* *astrosanjaysinghal* ??????????