*विषाद से योग तक - गीता की अनूठी शिक्षा*
गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जिसने विषाद को भी योग का रूप दे दिया है। विषाद में तो मन दुःखी होता है, फिर उसमें योग कैसा? यही तो गीता की खूबी है। गीता की विशेषता यह है कि जहाँ प्रायः ग्रन्थ तथा सिद्धान्त, विषाद से निकलने का उपाय विषाद छोड़ना बताते हैं, वहीं गीता विषाद त्याग के लिए विषाद को ही आधार बनाती है। किसी बाधा को पार करने के लिए बाधा को भी तो आधार बनाया जा सकता है। ऊँचा पर्वत किसी का मार्ग रोके खड़ा है, तो उसी पर्वत पर चढ़कर ही उसे पार किया जाता है। जो विघ्न बना हुआ था, वही विघ्न पार करने के लिए सहायक बन गया। समुद्र पार करने के लिए नाव, समुद्र के जल का आधार लेकर ही आगे बढ़ती है, इसी प्रकार यदि जगत का त्याग करना चाहते हो तो जगत से भागना नहीं, जगत में कूद पड़ो, उसे तैर कर पार करो। जगत त्याग का मार्ग जगत के बीच में से होकर ही जाता है। शत्रु से लड़ने के लिए शत्रु की आवश्यकता होती है। शत्रु यदि सामने युद्ध में न हो, तो मारा कैसे जाएगा? आप युद्ध छोड़कर भाग जाओगे तो शत्रु कैसे भगाओगे ? कौन मारेगा, कौन भगायेगा ?
यदि कोई जगत को ही जगत से पार जाने का माध्यम या आधार बना लेता है तो जगत बाधक नहीं साधक हो जाता है, मार्ग हो जाता है। *यही विषाद योग का आधार है, जिस पर सारा गीता-ज्ञान खड़ा है। गीता का भक्ति-मार्ग भगवान के सामने घण्टे - घड़ियाल बजाने या व्रत-उपवास करने का मार्ग नहीं, अपितु जगत में इस तरह रहना है कि आप जगत से प्रभावित नहीं तथा जगत आप के व्यवहार से प्रभावित नहीं हो।*
*गीता का कर्मयोग केवल कर्म करने का नाम नहीं है, कर्म करते हुए भी अकर्मी बने रहना कर्मयोग है।*
धर्म या कर्त्तव्य के पालन में मोह, लोभ, भ्रान्ति या ईर्ष्या-द्वेषादि को बाधा नहीं बनने देना ही कर्मयोग है। कर्म द्वारा, कर्म-बंधन से मुक्त होना ही कर्मयोग है। गीता का ज्ञान-मार्ग केवल शास्त्र के पन्ने उलटते रहने का ही नाम नहीं है। केवल वाद-विवाद में पड़े रहना तथा नित्य नए सिद्धान्तों को घड़ते रहने का नाम ही ज्ञान योग नहीं है। ज्ञान अन्तर से उदय होता है। जब तक भ्रम है तब तक कितना भी शास्त्र ज्ञान संचय करो, कोई लाभ नहीं। ज्ञान के लक्षण आपके व्यवहार में प्रकट होने चाहिए। ज्ञान, जगत में चारों दिशाओं में फैला हुआ है, किन्तु भ्रम के कारण अज्ञान की ही प्रतीत हो रही है। जगत यदि किसी के चित्त में अज्ञान का कारण बनता है तो वही, अज्ञान को हटाकर, ज्ञान का प्रकाशक भी है।
गीता को समझने के लिए विक्षेप तथा विषाद के अन्तर को समझना आवश्यक है, क्योंकि भगवान ने विषाद को आधार बनाया है, विक्षेप को नहीं। चित्त की विक्षिप्त अवस्था में मन, जगत के विषयों तथा सुख-सुविधाओं के लिए दुखी होकर, चंचल हो जाता है। काम, क्रोध, लोभ तथा अभिमान-स्वार्थ तात्कालिक कारण बनते हैं। चित्त में रजोगुण तथा तमोगुण का प्रभाव होता है। मन जगत विषयों में उड़ता फिरता है। जब विषय प्राप्त नहीं होते अथवा प्राप्त होकर, उनके वियोग की संभावना समक्ष आ खड़ी होती है, तो मन विक्षिप्त हो जाता है। ऐसा मन गीता-ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अनुपयुक्त होता है।
परन्तु अर्जुन का मन विक्षिप्त नहीं था, विषादयुक्त था, अर्थात् सत्वगुण प्रधान था। वह जगत के भोगो के लिए लालायित नहीं था, यदि होता तो झट अपने सगे-संबंधियों को मारने के लिए तैयार हो जाता, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। भले ही अर्जुन के मन में अपनों के लिए मोह उत्पन्न हो गया था, किन्तु वह मोह एक वैराग्ययुक्त चित्त का मोह था, विषयों से आसक्त मन का नहीं। इसीलिए अर्जुन के मुँह से निकला, “हस्तिनापुर का राज्य तो क्या, मुझे तीनों लोकों का राज्य भी मिले, तो भी मैं इन का वध नहीं करूँगा। ये लोग मुझे नि:शस्त्र देखकर मेरा वध भी कर डालें, किन्तु मैं इन्हें नहीं मारूँगा। यदि युद्ध क्षेत्र से विमुख होकर भाग जाने पर मुझे कायर कहकर निन्दा करें, तो उसे भी सहन कर लूँगा। वन में जाकर भिक्षा माँगते हुए तपस्या करना स्वीकार है, किन्तु इनसे युद्ध नहीं करूँगा।” यह सब बातें मन का वैराग्य ही दर्शाती हैं। चित्त की ऐसी अवस्था होने पर ही भगवान कृष्ण जैसे गुरु की प्राप्ति होती है, जो अपनी ज्ञान रूपी खड्ग से शिष्य के मोहरूपी बंधन को काट फेंकते हैं । तभी गीता-ज्ञान का अधिकार स्थापित होता है, तभी गीता-ज्ञान प्राप्त होता है ।
*astrosanjaysinghal*