श्रीमद्भगवद्गीता

*।। श्रीमद्भगवद्गीता ।।* _यथा एधांसि समृद्ध: अग्नि: भस्मसात कुरुते अर्जुन।_ _ज्ञानाग्नि: सर्व कर्माणि भस्मसात कुरूते तथा।।_ ( गीता - 4: 37 ) अर्थात जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, उसी तरह हे अर्जुन ज्ञान रूपी अग्नि भौतिक कर्मों के फल को भस्म कर देती है। अब यह बात शब्द के रूप में सबको समझ में आ जाती है। परंतु कृष्ण कह क्या रहे हैं इसे समझना दुरूह है। *ज्ञानाग्नि? अब यह क्या बला है?* कोई समझाए तो समझाए कैसे? समस्त कर्मों के परिणाम होते हैं यह तो सर्वकालिक सत्य है। कर्मों के परिणाम के कारण ही जन्म जन्मांतर का बंधन निर्मित होता है। परंतु यह कौन सी आग है जिसे भस्म करने की बात योगेश्वर कृष्ण कर रहे हैं? चक्रों के अनुसार आज्ञा चक्र होता है दो भृकुटियों के मध्य में। मेडिकल साइंस के अनुसार वहीं पर prefrontal cortex होता है जिससे समस्त कॉग्निटिव (संज्ञानात्मक) या perceptional विचारों का जन्म होता है। अर्थात सोच विचार, गुना भाग, उचित अनुचित, भूत भविष्य सब का सब मस्तिष्क के उसी हिस्से में चलता है। परंतु हमें यह पता नहीं चलता या संभवत: कभी कभार यह पता चलता है कि हम सोच क्या रहे हैं? है न यह आश्चर्य की बात। कभी ध्यान दिया आपने इस बात पर? इसे अचेतन मन कहा जाता है अध्यात्म की भाषा में। हमारे जीवन का लगभग 99 प्रतिशत भाग अचेतन अवस्था में गुजरता है। कृष्ण कह रहे हैं कि यदि आप चैतन्य रहते हैं और आपको यह पता चलता रहता है कि आपके भौतिक शरीर और मानसिक चेतना मे क्या क्या चल रहा है, तो मात्र उसे देखने या जानने से समस्त कर्मों के फलों का दहन हो जाता है जैसे आग में कोई लकड़ी डालने से उकसा दहन हो जाता है। पतंजलि ने इसे कहा है स्वाध्याय। यह नियम का अंग है। शौच संतोष तप स्वाध्याय ईश्वर प्रणनिधान। हमने स्वाध्याय का अर्थ समझा है: सेल्फ स्टडी। अर्थात स्कूल कॉलेज में जो शिक्षक पढ़ाता है, उससे इतर अपने आपसे कुछ और पढ़ना। अध्यात्म के संसार में इसका यह अर्थ नहीं होता। वहां इसका अर्थ होता है: सेल्फ की स्टडी। सेल्फ की स्टडी का अर्थ है, हमारे अंदर, हमारे मन में क्या चल रहा है, उसका अध्ययन करना। इसी से आत्मज्ञान शब्द भी संबंधित है। आत्म ज्ञान आत्मा का ज्ञान। अर्थात हमारे मन, हमारे शरीर और हमारी वाणी में क्या हो रहा है, उसके प्रति सजग या सचेत रहना। निरंतर। निरंतर न सम्भव हो तो कुक मिनटों के लिए, कुछ घड़ी के लिए। यहीं से शुरुवात होगी। निरंतरता का। पतंजलि का एक मंत्र है - *स तु दीर्घकाल नैरंतर्य सत्कार आसेवित: दृढ़ भूमि।* स्वाध्याय अर्थात अपने मन में क्या चल रहा है निरंतर उसको देखते रहना। मानसिक क्लेशों से घिरे इस संसार में इससे बड़ा उपयोगी कोई मंत्र नहीं है। मेरी बात पर विश्वास न करना। करके देखना। जब कभी भी परेशान हो किसी बात को लेकर, क्लेषित हो किसी कारण वश। आंख मूंदकर बैठ जाओ। और देखो क्या चल रहा है तुम्हारे मन में। मात्र देखो, उसको न छेड़ो न उसका विश्लेषण करो, न उसके बारे में गलत सही का निर्णय लो। मात्र देखो। परेशानी तो खत्म नहीं होगी, क्योंकि संसार में चुनौतियां हैं जिनको तुम्हें जीतना ही है। इसी की दौड़ है जीवन भर में। परंतु उन परेशानियों से परेशान होना कम हो जायेगा। या समाप्त हो जायेगा। इतना निश्चित है। *astrosanjaysinghal*