श्रीमद्भगवद्गीता

*।। जीवन की पूर्णता - कर्तव्य और कर्म ।।* जीवन सदैव अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जगत कल्याण की भावना के साथ जो व्यक्ति रहता है, वही जीवन है। यह वाक्य सनातन धर्म के मूल दर्शन का उद्घोष है। धर्मग्रंथों में जीवन को केवल श्वासों के आवागमन तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि इसे एक उद्देश्यपूर्ण यात्रा समझा गया है— कर्त्तव्य ( धर्म ) और परमार्थ ( जगत कल्याण ) की यात्रा। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश देते हुए कहा है - *कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।* *मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥* अर्थात्, तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि कर्तव्य-निर्वाह (कर्म) ही मनुष्य का एकमात्र अधिकार है, और उसे फलों की आसक्ति से रहित होना चाहिए। स्वार्थ के साथ किया गया कर्म न तो स्वर्ग दिला सकता है, न शिव की शरण, क्योंकि स्वार्थपूर्ण कर्म 'फल की आसक्ति' से दूषित होता है। जब कर्म निःस्वार्थ होकर परोपकार और जगत कल्याण की भावना से किया जाता है, तो वह निष्काम कर्म बन जाता है। यही कर्म व्यक्ति को स्वर्ग से भी ऊपर ले जाता है। परोपकार को धर्म का सार माना गया है। पद्म पुराण में कहा गया है- *परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।* अर्थात् परोपकार पुण्य के लिए होता है और दूसरों को पीड़ा देना पाप के लिए। जो व्यक्ति निःस्वार्थ सेवा में रत रहता है, उसका जीवन न केवल वर्तमान में सार्थक होता है, बल्कि वह मृत्यु के बाद भी अमर हो जाता है। *आज का दिन शुभ मंगलमय हो।* *astrosanjaysinghal*