श्रीमद्भगवद्गीता

*।। विविधता ही जीवन का उत्साह है ।।* लाभ-हानि, बुढ़ापा, संयोग-वियोग और मृत्यु के क्षण इस जीवन के अपरिहार्य यथार्थ हैं। इन्हें सहज भाव से स्वीकार करने से मन में निराशा का बोझ नहीं रहता। जब हम स्वार्थ का संकीर्ण दायरा त्यागकर परमार्थ की ऊँचाई की ओर बढ़ते हैं, तब निराशा का घना अंधकार अपने आप छँटने लगता है। दूसरों के हित में किया गया छोटा-सा कार्य भी मन को अपार शांति देता है। हमें बहुत अधिक निरर्थक वस्तुओं और अनावश्यक चिंताओं के बारे में नहीं सोचना चाहिए। निराशा से बचने के लिए जीवन में विविधता का होना परम आवश्यक है। कला, संगीत, साहित्य, मनोरंजन, खेल, तीर्थाटन और यात्रा आदि को अपनी रुचि के अनुसार दैनिक जीवन में स्थान देना चाहिए। प्रकृति की गोद में कुछ पल बिताना, किसी मित्र से हृदय की बात कहना अथवाा ध्यान-साधना का अभ्यास भी मन को नयी ऊर्जा देता है। इस प्रकार जब हम जीवन को संतुलित और रसपूर्ण बनाते हैं, तब हर परिस्थिति में भी उत्साह बना रहता है और जीवन वास्तव में जीने योग्य बन जाता है। *आज का दिन शुभ मंगलमय हो* *astrosanjaysinghal*