श्रीमद्भगवद्गीता

*।। जीवन की अंतिम खोज ।।* जीवन पर्यंत हम कुछ न कुछ खोजते रहते हैं। यह खोज वैसे ही प्रसुप्त है जैसे बीज में अंकुर छिपा होता है। हमने धन खोजा, हमने नाना प्रकार के संसाधन खोजे। विज्ञान की खोज से सुख-सुविधाओं को जुटाया। चिकित्सा के साधमय औषधियां खोजने पर भी स्वास्थ्य में गिरावट नहीं रोक पाए। बोध हुआ कि मृत्यु पर धन और सुविधाएं यहीं रह जाते हैं। सारा जीवन विभिन्न प्रकार की खोज में बिता देने के बाद अंत में अनुभव हुआ कि जो कुछ भी खोजा है, वह सब सारहीन है। जो साथ न जा सके वह सार कैसे होगा। जो श्वास-श्वास में साथ है, जो अंतिम सांस तक साथ रहता है, वही एकमात्र सार है। वह न धन है, न पद है, न शरीर है—वह तो आत्मा है, वह परमात्मा का अंश है। जब तक हम बाहर खोजते रहे, अशांति बनी रही; जैसे ही भीतर झांका, वही मिल गया जो कभी खोया ही नहीं था। यहाँ अपने के अतिरिक्त कुछ भी सार नहीं है। *आज का दिन शुभ मंगलमय हो।* *astrosanjaysinghal*