श्रीमद्भगवद्गीता

*।। धन की दौड़ में खोया सुख ।।* लोग जीवन को सुखी बनाने के लिए धन कमाने के विविध प्रयोजन करते हैं इस फेरे में अपना सुख और शांति खो बैठते हैं। वे साधन को साध्य बना लेते हैं। वे विचार नहीं कर पाते कि धन शरीर के लिए है न कि शरीर धन के लिए। इस अंधी दौड़ में मनुष्य परिवार, स्वास्थ्य और आत्मिक सुख को भी भूल जाता है। धन तो केवल जीवन को सुविधाजनक बनाने का माध्यम है, पर जब वह जीवन का लक्ष्य बन जाए तो वह विष बन जाता है। सच्चा सुख तो संतुलन में है – जहां धन की आवश्यकता पूरी हो, पर लालच हावी न हो। हमारे ऋषि-मुनि सदियों से यही संदेश दे रहे हैं कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है। जब हम विचारों को सही दिशा देते हैं, तभी जीवन एक सुंदर माला बन पाता है। इसीलिए विचार पर भी विचार करने की बात हमारे धर्म ग्रंथों में कही गई है। वस्तुत:, विचार फूलों को चुनने के समान है और सोचना उनको माला में गूंथना है। *आज का दिन शुभ मंगलमय हो।* *astrosanjaysinghal*